सच्ची कहानी एक सच्चे संगीतकार की, जो रुला देगी आपको

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कुछ लोग स्‍वभाव से कोमल होने के साथ-साथ जिद्दी भी होते हैं। लेकिन उनकी जिद अपनी मंजिल को लेकर होती है। वो किसी भी हाल में अपनी मंजिल को पा लेना चाहते हैं और पाकर ही दम लेते हैं। उनकी यही जिद, उनका यही व्‍यक्‍तित्‍व उन्‍हें सामान्‍य लोगों से अलग करते हैं और इस तरह के लोग बहुत कम ही मिलते हैं। प्रकाश राय का भी व्‍यक्‍तित्‍व कुछ इसी तरह का है। पेशे से शिक्षक हैं वो।  उत्‍तर प्रदेश के देवरिया जिले के रहनेवाले प्रकाश राय मिर्जापुर जिले के बी.एल.जे. इंटर कॉलेज में संगीत की शिक्षा देते हैं।

दरअसल, प्रकाश राय की बचपन से ही संगीत की दुनिया में कुछ करने की तमन्‍ना थी। इसीलिए बाधाएं चाहे जितनी भी आयीं, उन्‍होंने अपनी उम्‍मीदों की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। नतीजा, अब उनका वो सपना सच होने जा रहा है, जिसके लिए उन्‍होंने पिछले एक अर्से से रात-दिन एक किया हुआ था। जी हां, शिक्षक के साथ गायक और संगीतकार प्रकाश राय का सपना था कि उनका अपना एक हाईटेक रिकॉर्डिंग स्‍टूडियो हो, जिसमें वो अपनी पसंद की धुनों को रिकॉर्ड कर सकें। भोजपुरी एवं अवधी की पारंपरिक धुनों को सहेज सकें। प्रकाश राय का 5.1 स्‍टूडियो अब लगभग बन चुका है, जो मिर्जापुर के ही घंटाघर इलाके में स्‍थित है। संभवत: मकर संक्रांति से उसमें रिकॉर्डिंग शुरू हो जायेगी। स्‍टूडियो के निर्माण में उनके शिक्षक मित्र गोपाल जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

मिर्जापुर में बन रहे श्री रागरंग स्‍टूडियो का एक ही लक्ष्‍य

प्रकाश राय ने स्‍टूडियो का नाम रखा है ‘श्री रागरंग स्टूडियो’। यह नाम उन्‍होंने अपने गुरु जी के नाम पर दिया हुआ है। अपने स्‍टूडियो को सरस्‍वती का मंदिर मानने वाले प्रकाश राय और गोपाल जी का सबसे बड़ा संकल्‍प यह है कि इसकी छत के नीचे ऐसा कोई भी गीत तैयार नहीं किया जायेगा, जो भोजपुरी की मान-मर्यादा को प्रभावित करनेवाला हो।

बहरहाल, अपनी उम्‍मीदों को साकार होते देख प्रकाश राय इन दिनों बेहद भावुक हो चले हैं। जरा देखिए ये उनकी भावनाओं को प्रवाह नहीं तो और क्‍या है, जिसे उन्‍होंने अपने फेसबुक पर जाहिर किया है। प्रकाश राय ने लिखा है-

‘’फिर मुझे संगीत में आगे बढ़ने से किसी ने रोकने का प्रयास किया है। लेकिन मैं किसी के रोकने से रुकने वाला नहीं हूं। एक वह भी दौर था, जब घर वालों से संगीत के लिए मुझे लड़ना पड़ा। तब मैंने घरवालों और संगीत में से संगीत को ही चुना था और बोला कि घर छोड़ सकता हूं, लेकिन संगीत नहीं। फिर गांव वालों के ताने और कमेंट….नचनिया बजनिया…और भी न जानें, क्या क्या कहा लोगों ने। प्रयागराज में तब और भी कष्ट होता था मुझे, जब मैं कहीं भी रियाज करने बैठता, मकान मालिक और वहां के लोग आकर कहने लगते- अरे तुम क्या कर रहे हो, दिन भर चिल्लाते रहते हो। मेरे पास उन लोगों के लिए तब कोई जवाब नहीं होता था। लोग जब खाना खाकर सो जाते थे, और मैं हारमोनियम लेकर रात के 1:00 बजे घर की छत पर रियाज करने जाता तो वहां मोहल्ले वालों को मेरे रियाज से प्रॉब्लम होने लगती।

हद तो ये कि मैं जब दूसरा रूम देखने गया तो लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या करते हो…जवाब में मैंने जब ये बताया कि मैं संगीत सीखता हूं तो मकान मालिक ने तुरंत कहा- ‘अच्‍छा तो 2:00 बजे रात में तानसेन की तरह चिल्‍लाने वाले तुम्‍हीं हो। चले जाओ यहां से… यहां कोई रूम खाली नहीं है।‘ निराश होकर दूसरे मकान मालिक के पास गया। वह मुझे कमरा देने को तो तैयार हो गया। मैंने उसे पैसा दे भी दिया। लेकिन बाद में जब उसे पता चला कि मैं संगीत सीखता हूं और तीन बजे भोर में गाता हूं तो उसने भी पैसा लाकर वापस कर दिया। आखिरकार मैंने वो किया, जिसके अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मैंने अपना हारमोनियम उठाया और पहुंच गया अल्फ्रेड पार्क। वहां प्रयाग संगीत समिति की बगल में स्‍थित एक पेड़ के नीचे बैठकर रोजाना दो-तीन घंटा संगीत का रियाज करने लगा। लेकिन तानों ने वहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मुझे तमाम लोगों के ताने सुनने पड़े। मुझे यह नहीं समझ में आता कि दुनिया वाले संगीत के साधकों को समझते काहें नहीं हैं। संगीत के लिए मैंने एक समय सबको छोड़ दिया।

सही मायने में सपने वही होते हैं, जो चैन से सोने ना दें

आज कौन क्या सोचता है, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे लिए मेरा सबसे अच्छा दोस्त-मित्र-प्यारा सब कुछ वही रहेगा, जो मुझे मेरे लक्ष्य की प्राप्ति में अपना सहयोग देगा। वह मेरे लिए पूजनीय होगा। संगीत में आने से पहले घर वाले भी यही बोले थे कि अब तो मैं कुल खानदान की नाक कटवा दूंगा। जवाब आप सबको दूंगा। बस कुछ ही दिनों की बात रह गयी है। सब लोगों ने मेरे संगीत की वजह से मुझे छोड़ा, पर आज भी मैं गर्व के साथ कह रहा हूं कि दुनिया छोड़ सकता हूं, पर अपने संगीत को कभी नहीं। यह मेरे प्राणों के साथ ही जायेगा, क्योंकि आज भी मैं वही प्रकाश हूं, जो तीन  बजे भोर में अपनी जिंदगी की बात करता है। सच कहूं तो सपने वही होते हैं, जो चैन से सोने ना दें।‘’

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