वितरण ऑफिस खोलना दिनेश लाल यादव के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है

 

भोजपुरी इंडस्ट्री तबाह हो चली है…ऐसे में किसी फिल्‍म का चलना मृत्यु शैया पर पड़ी इंडस्ट्री के लिए किसी जीवन दान से कम साबित नहीं होगा. पिछले लगभग एक साल में गिनती की सिर्फ 2 फिल्में पवन सिंह की ‘वांटेड’ और खेसारी लाल की ‘दुलहिन गंगा पार के’ ही चली हैं. बाकी सभी बॉक्स ऑफिस पर शहीद हो गयीं.
अब बारी दिनेश लाल की ‘बार्डर’ की है, जो दिनेश के लिए उनकी इज़्ज़त और भविष्य दोनों का सवाल बन चुकी है. तभी तो उन्होंने उसे हिट कराने के लिए अपनी जान लड़ा दी है और आधी इंडस्ट्री को उन्होंने इस भयंकर गर्मी में पसीना बहाने के लिए क्रिकेट के मैदान में उतार दिया है. 7 गाड़ियां बैनर पोस्टर लगाए गांव खेड़े में जा-जाकर ‘बार्डर’ का प्रचार कर रही हैं, ताकि लोग फिल्‍म देखने थिएटर में आएं… लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस सबको देखने के बाद लोग थिएटर की ओर रुख करेंगे?
ट्रेड को नजदीक से समझने वाले एक वितरक कहते हैं कि इससे कुछ बहुत फायदा होने वाला नहीं है, क्योंकि प्रचार में बहाया जा रहा पैसा भी फिल्‍म की लागत में जुड़ जाएगा, और इसका प्रभाव फिल्‍म की रिकवरी पर पड़ेगा. उस वितरक के मुताबिक दिनेश और प्रवेश क्रिकेट देखनेवाले सभी लोग उनकी फिल्‍म देखने थिएटर तक जाएंगे, ये कदापि संभव नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि दिनेश के फैन उन्हें पर्दे पर देखने के लिए सिनेमा घरों में उमड़ पड़ेंगे, उन सिनेमा घरों में, जो रख रखाव के बदतर दौर से गुजर रहे हैं, जिनमें ए सी तो दूर, कूलर तक नहीं हैं.
माना कि वितरण ऑफिस खोलकर दिनेश ने एक नयी शुरुआत की है, लेकिन साथ ही उन्होंने अपने वितरकों का दिल भी दुखाने का काम किया है. और इसका असर निश्चित रूप से उस समय देखने को मिलेगा, जब दिनेश की होम प्रॉडक्शन के बाहर की फिल्मों के वितरण की बात आएगी.

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