‘रैंबो राजा’ का ट्रेलर रिलीज : कहानी और निर्देशन से ज्‍यादा अश्‍लीलता पर भरोसा


पॉवर स्‍टार संजीव मिश्रा, प्रियंका पंडित, रीतू सिंह, संजय पांडेय आदि अभिनीत फिल्‍म ‘रंबो राजा’ का ट्रेलर कुछ दिन पहले रिलीज हुआ। ट्रेलर देखकर ऐसा बिल्‍कुल नहीं लगा कि ये फिल्‍म आम भोजपुरी फिल्‍मों हटकर होगी। वही साउथ की फिल्‍मों की नकल वाली मारधाड़, मुंह से रंग की पिचकारी मारते गुंडे, दोअर्थी गीत, गंदे स्‍टेप्‍स,..सब कुछ वही। नया कुछ भी नहीं।

आखिर भोजपुरी मेकर कब ये समझेंगे की वो एक रिजनल फिल्‍म बना रहे हैं। नाम भोजपुरी का और सीन चुराओगे बॉलीवुड और तमिल-तेलुगू फिल्‍मों का। ना तो भोजपुरी पृष्‍ठभूमि ना उसमें भोजपुरी सुगंध, ना परिधान…केवल भोजपुरी में संवाद और चंद दोअर्थी गीत डलवा देने से वो भोजपुरी फिल्‍म नहीं बन जायेगी। बात समझ में आयी तो ठीक, नहीं आयी तो खुदा खैर करे।

धीरू यादव निर्देशित फिल्‍म इस फिल्‍म का ट्रेलर देखकर यही लगा कि अगर ट्रेलर भी न काटने आता हो तो उन्‍हें थोड़े दिनों तक किसी अच्‍छे डायरेक्‍टर के यहां बतौर असिस्‍टेंट काम कर लेना चाहिए। इससे उनके निर्देशन में निखार आयेगा। पेंट पोतकर हीरो के मुंह में तलवार थमाने का जिसका आइडिया होगा, उसे तो ऑस्‍कर एवॉर्ड देकर सम्‍मानित किया जाना चाहिए।

बात अगर एक्‍टिंग की करें तो संजय पांडेय सबसे वरिष्‍ठ कलाकार हैं और उनसे ज्‍यादा की उम्‍मीद करना ही बेमानी है। उनहोंने वही किया है, जो रोज करते रहते हैं। कुछ भी अलग नहीं। हीरोइनें तो भोजपुरी में खाली अश्‍लीलता परोसने के लिए रखी जाती हैं, वहीं यहां भी नजर आता है। नया होते हुए संजीव मिश्रा ने जो काम किया है, वो बेहतर लगा। अभी उन्‍हें अपने पंच पर और उच्‍चारण पर काम करने की जरूरत है।

एक बात और, भोजपुरी फिल्‍मों में गीतों के स्‍टेप्‍स देखकर एक बात साफ पता चलती है कि तथाकथित डांस डायरेक्‍टर पोर्न फिल्‍मों से अधिक प्रभावित हैं। ‘बहा बहा…लहा लहा’ के समय स्‍टेप्‍स देख लीजिए, बात समझ में आ जायेगी। निर्माता ऐसे डांस डायरेक्‍टर को ना जाने किस बात का पेमेंट देते हैं। सच तो यह है कि वो अगर हीरो-हीरोइन पर ही डांस छोड़ दें तो वे शायद इससे बेहतर स्‍टेप्‍स कर देंगे। कॉमेडी के नाम पर भोजपुरी फिल्‍मों में आजकल जमकर अश्‍लीलता परोसी जाती है, इस ट्रेलर में भी आप वही चीज पायेंगे।

दोअर्थी गीत लिखनेवालों को तो सीधे तिहाड़ जेल भिजवा देना चाहिए। पूरे ट्रेलर में केवल एक ही गीत थोड़ा ठीक है, जो सबसे आखिर में है। कुल मिलाकर एक बात साफ है कि लेखक-निर्देशक धीरू यादव को अपनी कहानी और निर्देशन पर भरोसा नहीं है, तभी तो उन्‍होंने इतने दोअर्थी गीत, दोअर्थी डायलॉग और अश्‍लील सींस का सहारा लिया है।

सीधे-सीधे कहा जाये तो ये भी आजकल बनने वाली तमाम भोजपुरी फिल्‍मों जैसी ही एक आम भोजपुरी फिल्‍म है, जिससे किसी तरह की बड़ी उम्‍मीद करना शायद सही नहीं होगा।