युवा निर्देशक अभिषेक तिवारी ने लिखा खुला खत : रवि किशन के एक इंटरव्यू‍ पर हो रही हैंं तीखी प्रतिक्रियाएं

admin

आदरणीय रवि किशन जी,

सादर नमस्कार ,

आज आपसे सम्बन्धित यह ख़बर पढ़ी मैंने। आपने इस अख़बार को दिए गए साक्षात्कार में कहा है कि भोजपुरी फ़िल्म के लेखकों में जुनून की कमी है, यह सुनकर मुझे गहरा ताज़्जुब हुआ कि एक मँजा हुआ कलाकार, जिसे भोजपुरी फिल्मों के बारे में क से लेकर ज्ञ तक की सारी जानकारी है और जिस व्यक्ति ने लगभग 100 से अधिक भोजपुरी फिल्में की हैं, वह व्यक्ति ऐसी बातें कैसे कह सकता है? यदि सिनेमा के प्रति बाकी के तकनीशियनों-कलाकारों की बात की जाए तो इन सबसे अधिक दिमाग वाला काम एक लेखक का होता है, क्योंकि उसी की तैयार की हुई नींव पर सिनेमा की इमारत खड़ी होती है, फिर वो चले तो सुपरहिट और ना चले तो हो गए चित। फिर भी इस भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक लेखक को किस नज़र से देखा जाता है? क्या आपसे कुछ छुपा हुआ है? क्या भोजपुरी फ़िल्म के किसी लेखक को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ फ़िल्म की स्क्रिप्टिंग करने दी जाती है? क्या किसी भोजपुरी फ़िल्म के लेखक को भरपूर मेहनताना दिया जाता है?

यहां तो कोई लेखक कोई नई और प्रयोगात्मक कहानी लेकर किसी के पास सिनेमा बनाने के लिए जाता है तो सीधे निर्माता / निर्देशक / सुपरस्टार उन्हें बोल देते हैं कि एक काम करो ये कहानी तो ठीक है, लेकिन अभी इस पर फ़िल्म नहीं बना सकते! इसमें मसाला नहीं है। फिलहाल एक काम करो कि फलां भाषा की ये फ़िल्म और फलां फ़िल्म दोनों देख लो और उन्हें  ही मिक्स करके कुछ अच्छा-सा लिख लो, तुम्हें हम ₹ 50,000 रुपया दे देंगे, ये ले लो टोकन के ₹ 20,000। उसके बाद एलबम के गाने को फ़िल्म में डालने को कहेंगे, नई रचना में समय और पैसा नहीं लगाएंगे, 20 से 25 दिन में पूरी फिल्म शूट कर लेना चाहेंगे तो क्या होगा?

यक़ीन मानिए, दुर्गति यहीं से शुरू हुई और आज परिणाम आप सबके सामने है। जब किसी प्रतिभा को उसका हुनर दिखाने का आप मौका ही नहीं दोगे तो आप फिर उसे दोष कैसे दे सकते हो? उससे भी आगे यदि कोई नया लड़का कोई बढ़िया कहानी लेकर किसी के पास पहुंचता भी है तो उससे उसका एक्सपीरियंस पूछा जाने लगता है और उसे अनुभवहीन मानकर काम ही नहीं दिया जाता, फिर कैसे आप किसी बदलाव की बात सोच भी सकते हैं। सिर्फ गिनती के चंद 10/12 निर्देशकों के दम पर पूरी इंडस्ट्री का खाका तैयार करने वाले लोग जब तक सम्पूर्ण निदान की ईमानदार पहल नहीं करेंगे, तबतक आप कैसे सुधार की उम्मीद कर सकते हैं?

आदरणीय रवि जी, आपने खुद कहा है कि आप एक मेगा बजट ₹ 400 करोड़ की फ़िल्म कर रहे हैं, अंदाज़ा लगाइएगा कि उस फिल्म में लेखक का बजट क्या होगा? कम से कम हज़ारों या लाखों में तो नहीं ही होगा, इसका मुझे पूरा-पूरा भरोसा है। तो आप रवि जी ईमानदारी से बताइएगा कि छोटा दर्शक वर्ग होने के बावजूद वो निर्माता दक्षिण भारत की भाषाओं में इतनी मंहगी फ़िल्म बनाने का जो जोख़िम उठा लेते हैं, वही काम हम आजतक भोजपुरी भाषा में क्यों नहीं कर पाए? क्या आजतक हम ₹ 5 करोड़ की एक भी फ़िल्म बनाने का साहस जुटा पाए हैं? नहीं, तो आख़िर क्यों? आपने ख़ुद कहा है कि भोजपुरी फिल्मों को दर्शक अब रेकॉग्नाइज कर रहे हैं, फिर हमारी इस इंडस्ट्री के पिछड़ने के पीछे क्या कारण रहा है? क्या प्रतिभा की कमी है? इम्तियाज अली, नीरज पांडेय, प्रकाश झा, अनुराग कश्यप, विनय पाठक, संजय मिश्रा, मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी जैसे लोग इसी मिट्टी की उपज हैं न आदरणीय? फिर आप सोचिये कि हमारा सिनेमा क्यों पिछड़ा हुआ है? हां, ये झूठ मत बोलकर कन्नी काट जाइयेगा कि भोजपुरी फिल्में केवल रिक्‍शेवाले देखते हैं, क्योंकि आप जैसा बोयेंगे, वैसा ही काटने को भी मिलेगा। आप सभ्य सिनेमा बनाएंगे तो दर्शक भी सभ्य मिलेंगे, बस कोशिश ईमानदारी से होनी चाहिए । धन्यवाद ।।

अभिषेक तिवारी, आरा भोजपुर, बिहार से।

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