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भोजपुरी इंडस्ट्री बर्बादी के मुहाने पर खड़ी है, मगर तथाकथित सुपरस्टारों की अकड़ जस की तस बनी हुई है। टैलेंट की कद्र न करना व चेहरा देखकर काम देने की परंपरा, घमण्ड और फिल्मों की नासमझी ने इंडस्ट्री की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब सब लोग कह रहे हैं कि उन्हें अश्लीलतायुक्त फिल्में नहीं करनी है!

मगर सोचनीय बात तो यह भी है कि क्या सिर्फ़ अश्लीलता ने इंडस्ट्री को इस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है?  या सुपरस्टारों की महंगी फीस, बड़ी बड़ी डिमांड और लॉबिंग भी इसके लिए जिम्‍मेदार हैं? अच्छी कहानियों का नहीं मिलना, सामाजिक सरोकार की कहानियों को भुलाकर मसाला फिल्में ही करना, बाकी कलाकारों को समान स्पेस ना देना, सब्जेक्ट को महत्व ना देना, मनपसंद कलाकारों को ही अपनी फिल्म में रखना आदि बातों ने भी इंडस्ट्री की बर्बादी में अपना भरपूर योगदान दिया है। सच तो ये है कि जब इस नए दौर में आपकी कोई फ़िल्म चल ही नहीं रही है तो आप अश्‍लीलता से दूर रहने की बातें करने लगे हैं। लेकिन इतना जान लीजिए कि जब तक आप उसी पुरानी परिपाटी के तहत फिल्‍में करते रहेंगे, तब तक दर्शक आपके नजदीक नहीं आयेंगे। जरा सोचिए तो सही कि नए दर्शकों को थियेटर तक लाने के लिए पिछले एक दशक में आपने क्या किया है?  हमें पता है कि आप ऐसा नहीं करेंगे। 
शुक्र मनाइए जनाब कि अभी इंडस्ट्री ज़िन्दा है, मरी नहीं। लेकिन दुःख भी मनाइए कि ये इंडस्ट्री जल्द ही डूब जाएगी। क्योंकि यहां अभी भी असहयोगी, दम्भी और अकड़ वाले लोग रहते हैं, उनको लगता है कि उनके पास पैसा है तो वे दूसरों की क्यों सुनें?  इसके पहले इतना लिख चुका हूँ कि अब नया कुछ लिखने को बचा ही नहीं।

पिछले सालभर के अंदर ही लगभग एक दर्जन बड़े बड़े रिकवरी देने वाले सिंगल स्क्रीन थियेटर बन्द हो चुके हैं या कुछ बंद होने के कगार पर खड़े हैं, आख़िर ऐसा क्यों हुआ?  क्या सिर्फ़ डिजिटल मार्केट को दोष देना सही रहेगा?  क्योंकि आज के दौर में भी हिंदी फिल्में थियेटरों से सैकड़ों करोड़ का कारोबार हफ़्ते भर में कर ले जा रही हैं। क्या डिजिटल का असर उनके ऊपर नहीं हुआ? विचार कीजिये, क्योंकि आप विचार करते ही नहीं! आप कब तक दगे हुए कारतूसों को ठूंसकर जबरदस्ती उनको सुपरस्टार का तमगा पहनाए रखियेगा?  कुछ इतर भी सोंचिये। इंडस्ट्री को बचाना है तो कुछ सकारात्मक, इनोवेटिव सोच को जन्म दीजिए। भस्मासुर मत बनिए, उठिए, जागिए। समय को पहचानिए।
समय है कि अभी भी नए लोगों को बड़े नाम वाले प्रोड्यूसर सुने, बड़े अभिनेता सब्जेक्ट पर ध्यान दें, पैसा का लोभ छोड़कर अच्छी विषयपरक सामाजिक फिल्में करें, संभव हो तो प्रॉफिट शेयरिंग पर काम करें, मल्टीप्लेक्स लायक विषय चुनें, 90 के दशक की फिल्मों के रीमेक बनाने से बचें व नए किंतु सामाजिक फिल्मों का सही चयन करें, गीत संगीत का विशेष ध्यान रखें, सिर्फ, ढोढ़ी, चोली, घाघरे में ना उलझे रहें।

अगर हमारी ये बात अच्छी लगे तो ठीक से विचार कीजिये कि हम और आप मिलकर इंडस्ट्री के सुधार के लिए क्या कर सकते हैं? अच्छा लगे तो निःसंकोच, घमण्ड त्यागकर संपर्क कीजिए, उम्र में छोटा हूँ मगर सुझाव कीमती रखता हूँ। वरना आपके लिए प्रवचन समाप्त हुए!

अभिषेक तिवारी

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