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भोजपुरी फिल्‍मों का असली बिजनेस किसी को साफ-साफ पता ना चले, इसके लिए हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं और इस काम में इंडस्‍ट्री के हर दिग्‍गज शामिल हैं। यही कारण है कि आज तक कोई भी ऑनलाइन टिकट बिक्री के मुद्दे को नहीं उठा रहा है। आज सारी दुनिया का कारोबार डिजिटल हो गया, लेकिन भोजपुरी इंडस्‍ट्री वहीं की वहीं घाघरा चोली और दुर्गंध भरे सिनेमाघरों में कैद होकर पड़ी है। दर्शकों को आज भी टिकट काउंटर पर पुराने जमाने की तरह लाइन में लगकर टिकट खरीदना पड़ रहा है।

चारसौबीसी का खेल

आइये समझते हैं कि चारसौबीसी का ये खेल खेला क्‍यों जाता है….दरअसल इसके निर्माता, निर्देशक, कलाकार से लेकर वितरक और प्रदर्शक यानी सिनेमा मालिक तक कोई भी नहीं चाहता कि भोजपुरी फिल्‍मों का बिजनेस ऑन लाइन हो, क्‍योंकि ऑनलाइन होने से पारदर्शिता आयेगी और चोरों और उनकी चोरी पर लगाम लग जाएगी।

सुपर फ्लॉप फिल्‍मों को बताते हैं सुपर हिट

दरअसल पारदर्शिता न होने के कारण ही यश मिश्रा, राकेश मिश्रा, प्रमोद प्रेमी, गुंजन सिंह जैसे घटिया फिल्‍में करनेवाले कलाकारों की सुपर फ्लॉप फिल्‍मों को भी इंडस्‍ट्री के दलाल सुपर हिट बताते नहीं थकते हैं। नतीजा, नये निर्माताओं को जाल में फंसाना आसान हो जाता है।

कलाकारों को साइन करवाकर लेते हैं दलाली

दरअसल, जब एक दलाल किसी फिल्‍म के लिए किसी निर्माता से किसी कलाकार को साइन करवाता है, तो उसे उस कलाकार से दस प्रतिशत दलाली मिलती है। अब दिनेश लाल निरहुआ, पवन सिंह और खेसारी की फिल्‍मों से तो दलाली मिलने से रही, दूसरे उनको लेने से बजट भी बड़ा हो जाता है, इसलिए दलालों की पूरी कोशिश रहती है कि दूसरी और तीसरी पंक्‍ति के अश्‍लील व गंदे कलाकारों को फिल्‍म दिलवा दी जाये। इससे दलालों को लाख-दो लाख की कमाई हो जाती है। और ये काम भोजपुरी के ज्‍यादातर पीआरओज करते हैं।

दलाल नये निर्देशकों से भी लेते हैं दलाली

इसी तरह का खेल निर्देशक के साथ भी खेला जाता है। दो-चार अश्‍लील एलबमों को डायरेक्‍ट कर डायरेक्‍शन का लबादा ओढ़कर इंडस्‍ट्री में फिरनेवाले नये निर्देशक तो बकायदा दलालों को सामने से बोलते हैं कि उन्‍हें वो यदि फिल्‍म दिलवाता है तो इतना प्रतिशत दलाली देगा। अब नये निर्माताओं को तो ये सब पता नहीं होता, सो बेचारे आसानी से उनके जाल में फंस जाते हैं और फिल्‍म बनते-बनते अपना सबकुछ लुटाकर सड़क पर आ जाते हैं।

सुनो लिट्टी-मटन की पार्टी देनेवाले भोजपुरी इंडस्‍ट्री के एक निर्माता की मस्‍त कहानी

यही वो कारण है, जिसके चलते न तो कलाकार चाहते हैं कि फिल्‍म के असली बिजनेस का पता चले और न ही निर्देशक चाहता है कि उसके निर्देशन की असलियत दुनिया के सामने आये, क्‍योंकि उन दोनों की ही नाकामी का पता चलने से उन्‍हें आगे काम मिलने का रास्‍ता बंद हो जायेगा।

चारसौबीसी के खेल में वितरक और सिनेमाघर मालिकों की मिलीभगत

बात अगर वितरकों की करें तो वो सबसे बड़े घाघ हैं और कुछ चोर-चारसौबीस टाइप के लोगों ने इस क्षेत्र में आकर पूरा खेल ही खराब कर रखा है। जानते हैं, न तो वितरक निर्माता को असलियत साफ-साफ बताता है और न ही सिनेमा मालिक अपने वितरक को ही असलियत बताना पसंद करता है। बीच में फिल्‍म बाबू भी मौका देखकर चारसौबीसी का खेल खेल लेता है। यही सब कारण है कि जो इज्‍जतदार निर्माता, निर्देशक और वितरक थे, उन्‍होंने या तो खुद को भोजपुरी इंडस्‍ट्री से अलग कर लिया है या फिर उनके पास काम ही नहीं है।

संक्षेप में इसे यूं समझिए कि हर कदम पर चारसौबीसी करने का इरादा रखनेवाले लोगों के बैठे होने के कारण भोजपुरी फिल्‍मों का बिजनेस ऑन लाइन नहीं किया जा रहा है और न ही किसी का फिलहाल ऐसा कोई इरादा ही नजर आता है। बस हर कोई चोरी और चारसौबीसी वाले सिस्‍टम का हिस्‍सा बने बैठा है। फिर आप ही बताइये कि भोजपुरी का कल्‍याण कैसे होगा….।

 

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