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पवन सिंह जिसका प्रचार करते हैं, उसका हारना तय है?

56 इंच सीने वाली पार्टी भाजपा भी शुभ अशुभ मानती है। इसका ताजा उदाहरण पवन सिंह के रूप में देखने को मिला। पहले पवन सिंह को टिकट से दूर किया गया, फिर स्टार प्रचारक की लिस्ट में भी शामिल नही किया गया। इसका सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि पवन सिंह के लोग ही उनको राजनीतिक अशुभ मान कर उनसे दूरी बनाये हुए है।

इस बारे में बात करने पर बहुत लोग कह रहे हैं कि पवन सिंह जिस राजनीतिक पार्टी या जिस राजनेता का दामन थामते हैं, उसका पतन हो जाता है। जो बचते हैं वह अपनी कूटनीति से। अब देखिए न, जीतन राम मांझी राजनीति के पायदान का एक बड़ा नाम है। उनके प्रचार के लिए पवन सिंह ने खुद मेहनत की है। हालात यह है कि माझी जी का राजनीतिक कैरियर खत्म ही समझो।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का प्रचार ऐसा किये कि उत्तर प्रदेश में गद्दी पाने को भी अखिलेश तरस गए। उनके खुद के जिला भोजपुर के आरा स्थित जोकहरी गांव के क्षेत्र से ब्लाक प्रमुख का चुनाव लड़े उनके खुद के भाई बृजमोहन सिंह उर्फ रानू भी बुरी तरह हार गए थे।

देवरिया से पवन सिंह की चापलूसी करने वाले संतोष सिंह पीस पार्टी से विधानसभा का चुनाव लड़े थे। उनकी भी लुटिया बिना पानी के डूब गई। उनका भी प्रचार पवन सिंह ने किया था। इसी तरह राजनीतिक पार्टी और उनके नेताओ की एक लंबी लिस्ट है, पवन सिंह ने जिनका-जिनका प्रचार किया, उनका कैरियर खत्म हो गया।

2019  के लोकसभा चुनाव में पहले पवन सिंह के एक चमचा विक्की ने  यह अफवाह उड़ाई कि पावन सिंह को कोलकाता से टिकट मिलेगा, फिर उसके एक मेकअप मैन मोनू पाठक ने अफवाह उड़ाई कि पवन सिंह को उत्तर प्रदेश के भदोही से टिकट मिलेगा। लेकिन अंत में जब हर जगह से पत्ता साफ हो गया तो पवन को उम्मीद थी कि स्टार प्रचारक का दर्जा जरूर मिलेगा, लेकिन वह भी उनको नसीब नहीं हो पाया। फिलहाल चर्चा जोरों पर है कि पवन सिंह जिसके प्रचार में जायेंगे, उसका हारना तय है। दिनेश लाल निरहुआ का क्‍या होगा, ये तो अब आनेवाला वक्‍त बतायेगा, क्‍योंकि पवन सिंह एक दिन निरहुआ का भी प्रचार करने आजमगढ़ पहुंचे थे।

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