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भोजपुरी गीत-संगीत और फिल्‍मों में छायी अश्‍लीलता को दूर करना कोई आसान काम नहीं है। देखा जाये तो यह सभ्‍यता-संस्‍कृति और भाषा पर किसी आतंकी हमले से कम नहीं है। लेकिन सुकून की बात ये है कि आज भोजपुरी से प्‍यार करनेवालों का एक विशाल वर्ग इन अश्‍लील हमलावरों का जमकर विरोध कर रहा है। लेकिन केवल विरोध करने से काम चलेगा नहीं, इसीलिए कई लोग इस संकल्‍प के साथ निर्माण के क्षेत्र में भी कूद चुके हैं कि वो श्‍लील गीत-संगीत और फिल्‍म परोसकर भोजपुरी की खोयी हुई प्रतिष्‍ठा को पुन: स्‍थापित करेंगे। ऐसे ही लोगों में एक नाम है लेखक-निर्देशक व गीतकार राजेश कुमार का, जो जल्‍दी ही दो बेहद साफ-सुथरी फिल्‍में ‘लाल’ और ‘दहेज दानव’ लेकर आने की तैयारी में लगे हुए हैं।

सच कहा जाये तो आज की तारीख में ‘दहेज दानव’ और ‘लाल’ जैसी संपूर्ण रूप से पारिवारिक फिल्‍म बनाने की हिम्‍मत दिखाना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन इन दोनों ही फिलमों के निर्माताओं तृप्‍ति फिल्‍म प्रोडक्‍शन और वैष्‍णवी फिल्‍म्‍स क्रिएशन माल की तारीफ करनी होगी, जिन्‍होंने मातृभाषा की मर्यादा के रक्षण के लिए इतना बड़ा कदम उठाया है।

इन दोनों ही फिल्‍मों के लेखक-निर्देशक और गीतकार राजेश कुमार बिहार के मोतीहारी जिले के बढ़़रवा फत्‍तेमोहम्‍मद गांव के निवासी हैं। उनका अभिनय के प्रति लगाव बचपन से ही था। जब वो छोटे थे, तभी से गांव में होने वाले उत्‍सवों और ड्रामा वगैरह में हिस्‍सा लिया करते थे। इसके अलावा स्‍कूल में आयोजित होनेवाले सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे।

टेलिफोन पर हुई बातचीत में राजेश कुमार बताते हैं, ‘‘एक्‍टिंग के अलावा मुझे कविता वगैरह लिखने का भी बचपन से ही शौक था। सात-आठ साल की उम्र में ही कविताएं लिखने लगा था। जानते हैं, मैं अपने स्‍कूल ‘ढाका उच्‍च विद्यालय ढाका, पूर्वी चंपारण’ का वह पहला छात्र था, जिसने चंदा मांगकर अपने विद्यालय में ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टीवी लगवाया था। आज की तरह उन दिनों टी वी हर किसी के पास नहीं हुआ करता था। टीवी होना अपने आपमें एक बड़ी बात समझी जाती थी।’’

राजेश कुमार अपने अब तक के सफर के बारे में बताते हैं, ‘‘फिल्‍मों में एक्‍टिंग का शौक 1987 में मुंबई खींच लाया। यहां आकर मैंने पृथ्‍वी थियेटर में बतौर एक्‍टर खूब काम किया। उन दिनों पंडित सत्‍यदेव दूबे सप्‍ताह में दो दिन वर्कशॉप करवाते थे। मैंने तीन साल तक उनके अंडर में रहकर एक्‍टिंग सीखी।’’

लेकिन वो कई बार इंसान जो करना चाहता है, वो नहीं कर पाता। शायद इसलिए भी कि किस्‍मत उस इंसान से कुछ और करवाना चाहती है। राजेश कुमार के साथ भी यही हुआ। वो कहते हैं, ‘‘मैंने बतौर एक्‍टर बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ खास कामयाबी नहीं मिली। ऐसा नहीं है कि मैंने फिल्‍मों में काम नहीं किया। मेरी पहली फिल्‍म थी ‘सनसनी-द स्‍टोर ऑफ क्राइम’। उसके बाद भी मैंने कुछ और भी फिल्‍मों में काम किये, लेकिन जो मैं चाह रहा था, वो मुझे नहीं मिला। शायद उसकी एक वजह ये भी थी कि मैं अपनी शर्तों पर काम करना चाहता था।’’

राजेश कुमार निजी तौर पर बेहद सरल स्‍वभाव के हैं, लेकिन काम के मामले बहुत ही जिद्दी टाइप के हैं। पढ़े-लिखे एक संस्‍कारी परिवार से होने के नाते राजेश कुमार सभ्‍यता, संस्‍कृति और मातृभाषा की मर्यादा को बखूबी समझते हैं। वो कहते हैं, ‘‘मुझे अपनी मर्यादा का हमेशा भान रहता है। मैं नहीं चाहता कि मेरी किसी भी कृति से मेरे घर-परिवार के लोगों या समाज को किसी भी तरह की शर्मिंदगी महसूस हो। एक्‍टिंग की एक जिद तो थी ही, सो मैंने किसी और बैनर के साथ मिलकर एक फिल्‍म प्रोड्यूस कर डाली, जिसमें मेन लीड मैंने ही की थी। उस फिल्‍म का नाम है ‘गंगा माई जइसन भउजी हमार’। इसके शीर्षक से ही आप समझ सकते हैं कि ये कितनी साफ-सुथरी फिल्‍म रही होगी। इस फिल्‍म की सबसे बड़ी उपलब्‍धि ये रही कि इसे डी डी बिहार पर लगातार 13 सौ बार प्रदर्शित किया गया था। इससे आप इसकी लोकप्रियता का अंदाजा लगा सकते हैं।’’

राजेश कुमार 14 साल पहले अपने पूरे परिवार के साथ पटना शिफ्ट कर गये और वहां कालिदास रंगालय और प्रेमचंद रंगशाला में होने वाले तमाम प्‍लेज से जुड़े रहे। उन्‍होंने तमाम इवेंट डायरेक्‍ट किये। कई कंपनियों के लिए जिंगल और विज्ञापन लिखे। नितीश कुमार के ही राज में ‘शौर्य समृद्धि’ संस्‍था के लिए उन्‍होंने ‘पंचायत राज शिक्षा अभियान’ एक डॉक्‍यूमेंट्री बनायी, जिसे प्रोजेक्‍टर के माध्‍यम से गांव-गांव तक दिखाया गया। इसके अलावा कई टेलिफिल्‍में, शॉर्ट फिल्‍में भी बनायीं। वो कहते हैं, ‘‘मैंने फिल्‍मों के अलावा कुछ एलबम्‍स भी किये हैं, लेकिन आप देखेंगे की मेरी हर कृति में एक थीम होगी, कोई न कोई मैसेज जरूर होगा। अब ‘मदिरा’ को ही देख लीजिए। है तो एक छोटी सी ही कहानी, लेकिन उसके माध्‍यम से मैंने समाज को एक बड़ा मैसेज देने की कोशिश की है।’’

राजेश कुमार पिछले तीस सालों से फिल्‍म जगत से जुड़े हुए हैं। क्‍या उन्‍हें इस दरम्‍यान कोई ऐसा निर्माता नहीं मिला, जो उनके हिसाब से फिल्‍म बनाने को तैयार हुआ हो? जवाब में वो कहते हैं, ‘‘आने को तो मेरे पास बहुत लोग आये, लेकिन उनकी शर्तों को मैं ही पूरा नहीं कर सका। दरअसल, हर निर्माता वही अश्‍लीलता परोसने की शर्त रखता था, उसे एक दो आइटम सांग चाहिए था, जो मुझे किसी भी हाल में मंजूर नहीं था। मैंने उन लोगों से साफ-साफ कह दिया कि मैं जब भी फिल्‍म बनाऊंगा, अपनी शर्तों पर ही बनाऊंगा और अपने हिसाब से बनाऊंगा, ताकि मैं खुद थियेटर में अपनी बेटी-बेटों और पत्‍नी के साथ बैठकर फिल्‍म देख सकूं। मेरा एक ही मकसद है कि मेरी फिल्‍में देखने हमारी बहन-बेटियां थियेटर तक आने के लिए मजबूर हो जायें, जो शर्म के मारे पिछले दस सालों से थियेटर में भोजपुरी फिल्‍में देखने नहीं जा पायी हैं।’’

यह पूछने पर कि क्‍या उन्‍होंने अश्‍लीलता को रोकने के लिए अपने स्‍तर पर कभी कोई प्रयास किया? जवाब में वो कहते हैं, ‘‘जी बिल्‍कुल किया। शायद आपको यकीन नहीं हो मैंने एक-एक स्‍टूडियो में जाकर लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि वो अश्‍लील गीतों की रिकॉर्डिंग न करें। यहां तक कि लोगों को जागरूक करने के लिए पटना में कैंडल मार्च भी निकाला था।’’

राजेश कुमार से बातचीत कर एक बात ये समझ में आयी कि उन्‍होंने एक लंबे समय तक लगातार साफ-सुथरी फिल्‍में बनाने की पुख्‍ता प्‍लानिंग की है। उनके इस कदम में कंधा से कंधा मिलाकर कुछ निर्माता भी खड़े हैं, जो अपनी मातृभाषा की धूमिल हुई छवि से आहत हैं। उन्‍हें पूरा यकीन है कि वो जल्‍दी ही अपना मकसद पा लेंगे और भोजपुरी को उसकी खोयी प्रतिष्‍ठा हासिल हो जायेगी।

-एस एस मीडिया डेस्‍क से  

 

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