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जो मातृभाषा के नहीं, वो मातृभूमि के नहीं : अश्‍लीलों को टिकट देना दुर्भाग्‍यपूर्ण

जो मातृभाषा के नहीं, वो मातृभूमि के नहीं। ये बात भोजपुरी के उन कलाकारों के संबंध में कही जा रही है, जिन्‍होंने घाघरा-चोली और नाभि दिखा-दिखाकर भोजपुरी फिल्‍म इंडस्ट्री पर सॉफ्ट पोर्न का ठप्‍पा लगा दिया है और अब जब यहां उनका बोरिया-बिस्‍तर बंधने की नौबत आयी है तो वे राजनीति जगत में दो-दो हाथ कर रहे हैं। देखने वाली बात ये है कि उनका प्रचार करने के लिए मुंबई से वो सभी बारी-बारी से चुनाव मैदान में पहुंच रहे हैं, जो आज तक भरी सभा में भोजपुरी की इज्‍जत को तार-तार करते आये हैं।

यहां एक बात गौर करने लायक ये है कि इन लोगों ने क्रमवार तरीके से भोजपुरी को गंदा किया है। सबसे पहले गीत-संगीत की दुनिया को गंदा किया, फिर फिल्‍मों में गंदगी फैलायी और अब राजनीति की दुनिया में पहुंचने की तैयारी में लगे हुए हैं। वो कहावत तो आपने सुनी हुई होगी कि जिसका जो स्‍वभाव होता है, उसे वो कभी नहीं छोड़ता, चाहे वो कहीं भी जाये।

अब ये तो सभी को पता है कि जिस तरह दिनेश लाल निरहुआ, पवन सिंह और खेसारी लाल गंदे गीत गाकर कुख्‍यात हुए, उसी तरह उनसे ही प्रेरित होकर आज हजारों ऐसे गायक पैदा हो चुके हैं, जिनके गंदे गीतों की दुर्गंध से यू ट्यूब अटा-पड़ा है। दरअसल उन लोगों ने अपने मन में बिठा लिया है कि जैसे निरहुआ, पवन और खेसारी गंदे गीत गाकर हीरो बन गये, उसी तरह वो भी एक दिन हीरो बन जायेंगे। अफसोस की बात ये है कि वैसे ही गिरी हुई मानसिकता वाले कुछ नीच प्रोड्यूसर्स भी यहां हैं जो यू ट्यूब के उन घटिया गंदे गायकों को लेकर फिल्‍में बना रहे हैं।

लेकिन बात यहीं नहीं रुक गयी है। मनोज तिवारी ने ऐसे गंदे लोगों के लिए एक और दरवाजा खोल दिया है। उनकी ही कृपा से अब जब कि निरहुआ, पवन और खेसारी राजनीतिक जगत में एंट्री ले चुके हैं तो बाकी बचे उन गंदे गायकों में ये संदेश जा रहा है कि पहले गंदा गाओ, फिर हीरो बनो और अंत में राजनीति में चले जाओ।

सच कहा जाये तो सभ्‍यता और संस्‍कार की परवाह करने की बात करनेवाली भाजपा ने इन अश्‍लील गायकों और नायकों को राजनीति में प्रवेश देकर देश का बहुत बड़ा नुकसान किया है। आज नहीं तो कल इसका परिणाम देखने को भी मिलेगा। आज कई भाजपा और मोदी समर्थक मतदाता इस बात को लेकर क्षुब्‍ध एवं पशोपेश में हैं कि वो आखिर वोट किसे दें। कारण वही है कि वो भाजपा समर्थक तो हैं, लेकिन अश्‍लील प्रत्‍याशियों के विरोधी हैं।

एक क्षण के लिए सोच लीजिए कि अगर चुनाव परिणाम खुदा-न-ख्‍वास्‍ता नजदीकी और विपरीत रहा तो इतना तो मान ही लेना पड़ेगा कि ऐसे लोगों को टिकट देकर भाजपा ने अपने ही हाथों पर अपनी टांग पर कुलहाड़ी मार ली है।

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