चिंटू पांडेय ने ‘पांडेय जी का बेटा हूं…’ वाला कांवर गीत गाकर एक बार फिर जातिगत द्वेष को हवा दिया है

भोजपुरी सभ्‍यता-संस्‍कृति-संस्‍कार व गीत-संगीत से लेकर कला तक, भोजपुरी के हर पहलू पर अगर किसी ने कुठाराघात किया है, तो वो हैं भोजपुरी इंडस्‍ट्री के लोग। खास तौर से गीत-संगीत को तो आल इन लोगों ने घटियापन के उस स्‍तर को पहुंचा दिया है, जिसकी कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था और जहां से भोजपुरी को वापस अपनी प्रतिष्‍ठा पाने में शायद कई-कई पीढ़ियां गुजर जायेंगी।

मिसाल के तौर पर राजकुमार पांडेय जैसे वरिष्‍ठ मेकर के बेटे प्रदीप पांडेय उर्फ चिंटू पांडेय को देख लीजिए। इन्‍होंने ‘माई रे माई हमरा उहे लइकी चाही’ में एक घटिया गीत किया था- ‘पांडे जी का बेटा हूं, चिपक कर चुम्‍मा लेता हूं’।

चिंटू ने इस गीत में एक्‍टिंग तो की ही थी, अपनी आवाज भी दी थी। हैरत की बात ये कि इस जातिवादी आपत्तिजनक गीत को चिंटू के साथ एक दूसरे पांडेय यानी रितेश पांडेय ने भी आवाज दी और इन दोनों का साथ इंदू सोनाली ने दिया है, जो भोजपुरी में अश्‍लील गीतों को गाने के लिए जानी जाती हैं। इनमें से किसी एक को भी नहीं लगा कि ऐसे शब्‍द नहीं गाने चाहिए। इससे समाज में गलत मैसेज जायेगा। एक प्रकार का जातिगत मतभेद खड़ा होगा।

ध्‍यान रहे, इसी गीत के बाद अन्‍य जाति के घटिया गायकों ने गीत गा-गाकर एक दूसरे जाति पर निशाना साधना शुरू किया था। लेकिन हाल ही में जब यह मामला पांडेय जी के बेटा से होते हुए बेटी तक पहुंचा तो लोगों ने उसका जमकर विरोध शुरू हो गया। जौनपुर के एक ऐसे ही एक गायक को न केवल इसके लिए सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी, बल्‍कि कोर्ट से अपनी जमानत करवानी पड़ी है और अदालती पचड़ा अभी भी चल रहा है।

लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद उसी चिंटू पांडेया का अब नया तमाशा देखिए। एक बार फिर उन्‍होंने उसी आपत्‍तिजनक गीत के शुरुआती बोल को आधार बनाकर कांवर गीत गाया है। गीत के बोल हैं- पांडेय जी का बेटा हूं, भोले बाबा का चहेता हूं’। इंदू सोनाली ने इसमें भी चिंटू का साथ दिया है।

अब आप खुद ईमानदारी से बताइये कि आपको नहीं लगता कि इस गीत के गीतकार और गायक दोनों ही मानसिक रूप से दिवालिया हो चुके हैं और दोनों ही उस विवाद को भुनाकर यू ट्यूब पर अपना व्‍यूज बढ़ाना चाहते हैं। अब आप कहेंगे कि चिंटू और गीत के लेखक श्‍याद देहाती जैसे लोगों को भला व्‍यूज की क्‍या आवश्‍कता है, तो जवाब में मैं एक बार फिर यही कहूंगा कि हां उन्‍हें आवश्‍यकता है। इन लोगों के पास कंटेंट अब नहीं रह गया है। ना ही ये कुछ नया कर सकते हैं। बस अश्‍लील और स्‍तरहीन चीजें ही परोस सकते हैं।

 

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