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कोई भी फिल्‍म हो, उसका शीर्षक उसके लिए बहुत मायने रखता है। लेकिन भोजपुरी इंडस्‍ट्री में आजकल के मेकर्स के लिए शीर्षक खिलवाड़ बन गया है। कहानी कुछ और शीर्षक कुछ और। किरदार कुछ और, गेट-अप कुछ और। मजे की बात ये है कि अगर कोई इस पर प्रतिक्रिया जाहिर करे तो वो भी भोजपुरी वालों को अच्‍छा नहीं लगता।

उदाहरण के लिए यहां हम दो फिल्‍मों का नाम लेना चाहेंगे। एक है खेसारी लाल की ‘कुली नं.1’ और दूसरी है प्रदीप पांडेय उर्फ चिंटू की ‘प्रेमगीत’। खेसारी की फिल्‍म के पोस्‍टर और ट्रेलर देख लीजिए, आप कन्‍फ्यूज हो जायेंगे कि किस कुली की बात की जा रही है। हां, ज्‍यादा बोलेंगे तो खेसारी लाइव होकर आपको समझा देंगे कि कुली का मतलब क्‍या होता है…उनके डायरेक्‍टर लाल बाबू पंडित भी कम नहीं हैं। भाषण देना शुरू कर देंगे कि उनकी नजर में समाज का बोझ उठानेवाला भी कुली ही होता है। जानते हैं, वो यही साबित करने की कोशिश करेंगे कि यहां समझदार केवल वो खुद और खेसारी ही हैं, बाकी लोग बकलोल हैं।

 इसी तरह आप चिंटू की ‘प्रेमगीत’ का टीजर देख लीजिए। वर्दी में धूमधड़ाम और फिल्‍म का नाम है ‘प्रेमगीत’। ऊपर से कानों में बाला भी पहन रखा है। बाला वाला जवान बना दिया। एक बात और, चिंटू की आवाज उस रोल के हिसाब से एकदम बकवास है। उसे तो किसी से डब करा देना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होगा। कुल मिलाकर यही कहेंगे कि हाय रे भोजपुरी वाले, हाय रे भोजपुरी फिल्‍में।

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