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क्‍या ‘एक प्‍यार का नगमा है…’ गीत के लेखक संतोष आनंद की खैर-खबर लेने के लिए भी कोई रेशमिया आगे आयेगा?

पश्‍चिम बंगाल के रेलवे स्‍टेशन पर सालों से गाना गाकर जीवन यापन कर रहीं रानू मंडल रातों रात सुर्खियों में छा गयीं हैं। और उन्‍हें जिस गीत से चमकने का अवसर मिला है, उसे लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया है। लक्ष्‍मीकांत प्‍यारे लाल के संगीत से सजे फिल्‍म ‘शोर’ के उस गीत ‘एक प्‍यार का नगमा है….’ को लिखा है संतोष आनंद ने। लेकिन समय का तकाजा देखिए कि उस गाने को गाकर भिक्षाटन करनेवाली रानू मंडल आज सुर्खियों में हैं, जबकि उस गीत के लेखक संतोष आनंद गुमनामी में जी रहे हैं और उनकी खोज-खबर लेनेवाला आज कोई हिमेश रेशमिया नहीं है।

इसी तरह कुछ दिन पहले एक और दिव्‍यांग लड़की ने ‘सत्‍यं शिवं सुंदरम् …’ गीत गाकर धूम मचायी थी। तब भी फिल्‍मवालों ने खूब टीआरपी बटोरी थी। लेकिन आज उसका कहीं अता-पता नहीं है।

जिस गीत- ‘एक प्यार का नगमा है… को गाकर रानू मंडल की किस्मत बदली, उसके गीतकार संतोष आनंद गुमनामी में आज भी जीवन बिता रहे हैं।
अपनी बेटी को गोद में लेकर लिखा था – ये गलिया ये चौबारा, यहां आना न दोबारा…
उन्होंने कहा मैंने जो भोगा, उसमें से कुछ पल निकालकर गीतों में पिरोया
एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है… जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है… को गाकर स्टेशन पर भीख मांगने वाली रानू मंडल की किस्मत बदल गई, उस गीत को लिखने वाले मशहूर गीतकार संतोष आनंद आज भी गुमनामी के दौर में हैं। उन्हें अपनी जिंदगी चलाने के लिए छोटे-मोटे कवि सम्मेलनों से खर्च निकालने पड़ रहे हैं।

आजकल रोजाना लोगों के फोन आ रहे हैं कि आपके गीत को गाकर भीख मांगने वाली महिला को हिमेश रेशमिया ने अपनी फिल्म में काम करने का मौका दिया। मेरे पास स्मार्ट फोन भी नहीं है कि मैं रानू मंडल के गाए इस गीत को सुन पाउं।

उन्होंने कहा अब तो केवल जी रहा हूँ । बेटे की मौत के बाद जिंदगी के सारे रंग चले गए। वैसे भी 1995 के बाद ही फिल्मों में गीत लिखना हमने बंद कर दिया था, बाद में कुछ कवि मित्रों के विशेष आग्रह पर मंच पर दोबारा गीतों को सुनाना शुरू किया, लेकिन अब इन गीतों में न तो कोई रंग और न ही उमंग है। घर के खर्चे चलाने के लिए कवि सम्मेलनों में आता हूं। शरीर अब साथ छोड़ रहा है और व्हील चेयर्स पर जिंदगी सवार हो गई है।

आज गीतों पर बाजार हावी

लोकप्रिय गीतों के बारे में कहते हैं- पहले भी बाजार था, लेकिन उसके साथ कला भी थी। लेकिन आज गीतों पर बाजार हावी है और कला गायब है। मैंने जो भोगा, उसमें से कुछ पल निकाल गीतों में पिरोया। पूरी जिंदगी संघर्ष में बीती है। आज भी याद है जब राज कपूर ने फिल्म प्रेम रोग के लिए एक विदाई के गीत लिखने को कहा- तो वे सीधे दिल्ली अपने घर आ गए। उस वक्त बेटी छोटी थी। उसे गोद में लिया और बेटी की विदाई की कल्पना करने लगे। मेरी आंखों से आंसू निकलते रहे और फिर गीत-ये गलिया ये चौबारा…का जन्म हुआ। पहले ऐसे ही गीत लिखे जाते थे। फिल्म क्रांति के मुजरा- मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा…में भी जिंदगी की फिलॉस्फी है।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ मेरी जोड़ी रही हिट रही। मैं फिल्मों में अच्छे और यादगार गीत इसलिए दे पाया क्योंकि मैं साहित्य की पृष्ठभूमि से आया था। गीतों के साथ ही उस वक्त के संगीतकार भी उम्दा थे। आजकल सारी व्यवस्थायें बदल चुकी है।

-अवनीश राही की टाइम लाइन से साभार


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