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भोजपुरी फिल्‍मों के भविष्‍य को गर्त में पहुंचाने का काम केवल निर्माता-निर्देशकों और कलाकारों ने ही नहीं, कुछ वितरकों और पीआरओज ने भी किया है। माना कि आज की तारीख में किसी भी फिल्‍म का प्रचार किया जाना बहुत जरूरी है, लेकिन वो प्रचार ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि सच्‍चाई से कोसों से दूर हो।

मसलन लाख विरोध के बावजूद अभी भी इंडस्‍ट्री में चाटुकारों का एक ऐसा खेमा है जो फिल्‍म रिलीज होने के पहले ही सुपर हिट लिखना शुरू कर देते हैं ओर मजे की बात ये कि उन चाटुकारों को उनके आका मना भी नहीं करते हैं। जहां तक वितरक और पीआरओ के झूठे प्रचार की बात है तो इसकी गवाही कोई और नहीं, बल्‍कि उन लोगों के सोशल मीडिया में किये गये पोस्‍ट ही कर रहे हैं।

ताजा मामला ‘कुली नं.1’ का है। इस फिल्‍म के बारे में इन दिनों एक रणनीति के तहत यह कहकर जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि यह अब तक की सबसे सफल फिल्‍म है। दरअसल, इस बात की शुरूआत तब हुई, जब एक पोस्‍ट पर कमेंट करते हुए एक वितरक महोदय ने ये लिखा कि खेसारी की ये फिल्‍म इस साल की सबसे कामयाब फिल्‍म रही है और वितरक की इस बात को हवा देने का काम एक पीआरओ ने किया, जिसका ‘कुली नं.1’ से प्रत्‍यक्ष तो वास्‍ता नहीं है, लेकिन अप्रत्‍यक्ष रूप से हर फिल्‍म से वास्‍ता रहता है।

फिर पूछना ही क्‍या था कि फिल्‍म के अधिकारिक पीआरओ महोदय सामने आये और उनके भाड़े के लेखकों ने लिख मारा कि 2019 की अब तक की सबसे सफल फिल्‍म ‘कुली नं.1’ है। अब जरा हकीकत देखिए। चूंकि बाकी थियेटर वाले अपने आंकड़े खुद नहीं जारी करते, मगर आनंद मंदिर, वाराणसी अक्‍सर अपनी फिल्‍मों का कलेक्‍शन सोशल मीडिया में शेयर करता रहता है। सो दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप हो गया। याद रहे, वाराणसी का आनंद मंदिर भोजपुरी फिल्‍मों का मक्‍का कहा जाता है। कहने का मतलब ये कि इस थियेटर में किसी भी कलाकार की कोई भी फिल्‍म लगा दी जाये, कुर्सियां भरसक खाली नहीं रहतीं।

अब हम आते हैं उस ‘कुली नं.1’ के कलेक्‍शन पर, जिसे अब तक की सबसे सफल फिल्‍म कहकर प्रचारित किया जा रहा है और सुना है कि खेसारी मन ही मन खयाली पुलाव भी खूब पका रहे हैं। जरा स्‍क्रीन शॉट देखिए- वाराणसी के आनंद मंदिर में इस फिल्‍म ने पहले सप्‍ताह में कलेक्‍शन किया है 2 लाख 68 हजार 8 सौ 61 रूपये 2 पैसे का, जबकि उसी आनंद मंदिर में ‘क्रेक फाइटर’ ने पहले सप्‍ताह में 2 लाख 82 हजार 4 सौ बानवे रुपये चौवन पैसे का कलेक्‍शन किया था।

अब आप ही सोचिए कि इन आंकड़ों के आधार पर क्‍या ‘कुली नं.1’ को सबसे सफल फिल्‍म कहकर प्रचारित करना सही है? जवाब है, बिल्‍कुल नहीं। बेसिरपैर की बातें कहने और लिखने से लोगों के बीच न केवल वितरकों और पीआरओज की बातों पर अविश्‍वास पैदा होता है, बल्‍कि लोगों में ये मैसेज भी जाता है कि इस इंडस्‍ट्री में ज्‍यादातर चार सौ बीस भरे पड़े हैं। जाहिर है कि इस तरह के झूठे प्रचार से किसी को व्‍यक्‍तिगत तौर पर भले ही थोड़ा बहुत फायदा हो जाये, लेकिन भोजपुरी को नुकसान के बजाय फायदा कभी नहीं होनेवाला है। इंडस्‍ट्री का मौजूदा हाल इस बात की तस्‍दीक भी कर रहा है।

-एस.एस.मीडिया डेस्क  


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