काजल राघवानी ने खुल्‍लम-खुल्‍ला खेसारी का नाम लेकर छठ आस्‍था के साथ किया मजाक

छठ परम पावन त्‍यौहार है। इसके साथ किसी तरह का भद्दा मजाक नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन भोजपुरी इंडस्‍ट्री के लोगों को कौन समझाये। अश्‍लीलता के गर्त में भोजपुरी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को धकेलनेवाले चंद भोजपुरी कलाकारों और म्‍यूजिक कंपनियों ने अब आस्‍था और विश्‍वास के प्रतीक हमारे पर्वों के साथ भी खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है।

दरअसल हम बात काजल राघवानी के गाये एक छठ गीत की कर रहे हैं। इस गाने की शुरूआत काजल ने कुछ इस तरह की है- कांचे कांचे बांस की बहंगिया, बहंगी लचकत जाय….पेन्‍हीं न खेसारी जी पियरिया, दउरा घाटे पहुंचाय….।

माना कि काजल और खेसारी के कथित रुप से बेहद करीबी संबंध हैं, लेकिन उसका मतलब ये तो नहीं है कि वो परम पवित्र त्‍यौहारों में इस तरह नाम लेकर गलत परंपरा की शुरुआत करें। काजल के लिए छठ का गीत किसी अन्‍य गीत की तरह हो सकता है, लेकिन इसका व्रत रखनेवालों को ये कतई अच्‍छा नहीं लगेगा। इतना ही नहीं, काजल मुखड़े में ‘खेसारी जी’ और बाद में ‘बलम जी’ कहकर गाती हैं। लेकिन वीडियो पर जो नाम दिख रहा है, उसमें बलम जी का जिक्र किया गया है। इसीसे इनकी मंशा का पता चलता है।

काजल राघवानी को कम से कम इतना तो समझना चाहिए कि ये फिल्‍म नहीं है कि आप भांड़गिरी करें। छठ एक आस्‍था और विश्‍वास का पर्व है। इसके लिए सुहागिन औरतें बड़ा तप करती हैं और सूर्यदेव को अर्घ्‍य देकर अपनी मन्‍नतें मांगती हैं। क्‍या काजल ने खेसारी के साथ वो संबंध बना लिये हैं कि उनके साथ छठ का व्रत कर सकें…और यदि नहीं तो ये कोई फिल्मी पर्दा नहीं है कि वो जो मन में आयें, वो गाकर छठ की निष्‍ठा पर कीचड़ उछालें। खेसारी को भी इस पर आपत्‍ति जतानी चाहिए।

काजल और उनके खासमखास खेसारी को अगर छठ के बारे में नहीं पता है तो उनकी जानकारी के लिए यहां कुछ बातों का उल्‍लेख किया जा रहा है, ताकि उन्‍हें इस व्रत की पवित्रता का एहसास हो और अपनी गलती के लिए लोगों से माफी मांगें।

दरअसल, छठ व्रत एक कठिन तपस्या की तरह है, जो अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है। कुछ पुरुष भी इस व्रत को रखते हैं। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग करना पड़ता है। पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रती महिला फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नये कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गयी होती है। व्रती के लिए ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालों साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। पुरुष भी पूरी निष्ठा से अपने मनोवांछित कार्य को सफल होने के लिए व्रत रखते हैं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।

कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।

एक कथा के अनुसार राजा  प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्‍यप ने पुत्रेष्‍टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ, परन्तु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या  देवसेना प्रकट हुईं और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक महीने के शुक्‍ल पक्ष की षष्‍ठी को हुई थी।

 

 

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