एक दिन में 37 लाख व्‍यूज से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला है ‘क्रेक फाइटर’ पर वीरू ठाकुर


भोजपुरी इंडस्‍ट्री यानी झूठा प्रचार का अड्डा और इस अड्डे पर दो काम होे ेगाूब के उस व्‍यूज को लेक्‍र vता है- एक तो सच को ढंकना और दूसरा झूठ को प्रमोट करना। कई बार ऐसा भी होता है कि आधे सच को भी यहां पूरे सच के रूप में पेश किया जाता है।

एक बात और- यहां यू ट्यूब के व्‍यूज को ही कामयाबी का पैमाना मान लिया गया है, क्‍योंकि उसी व्‍यूज को दिखाकर निर्माताओं को आये दिन ठगा जा रहा है। और निर्माता भी ऐसे हैं कि उन्‍हें इतना भी नहीं समझ में आता है कि उन्‍होंने जो फिल्‍म बनायी है, वो थियेटर के लिए बनी है या यू ट्यूब के लिए। अगर थियेटर के लिए बनी है तो फिर यू ट्यूब के व्‍यूज क्‍यों देखकर खुश होते हैं वो? यू ट्यूब पर हीरो और थियेटर में जीरो।

चलिए, अब आपको एक ताजा उदाहरण के जरिए समझाते हैं। पवन सिंह की कथित रूप से अब तक की सबसे महंगी फिल्‍म ‘क्रेक फाइटर’ होली पर रिलीज होने जा रही है, जिसका ट्रेलर इसी रविवार को रिलीज किया गया। उस ट्रेलर को वेव भोजपुरी चैनल पर रिलीज किया गया है, जो गंदे गीतों का खजाना है और उसके इस समय 2 करोड़ 28 लाख के करीब सब्‍सक्राइबर्स हैं। जाहिर है कि जितने सब्‍सक्राइबर्स हैं, उतने लोगों के पास उस ट्रेलर का नोटिफिकेशन गया होगा।

लेकिन 2 करोड़ 28 लाख लोगों में से जैसे ही मात्र 37 लाख लोगों के व्‍यूज मिले, फिल्‍म के लेखक वीरू ठाकुर ने हर हर महादेव का पोस्‍टर टांग दिया सोशल मीडिया पर। वीरू ठाकुर का यह अंदाज देखकर ऐसा लगा, जैसे उन्‍होंने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। अब जो लोग ट्रेड को नहीं जानते, उनको तो यही लगेगा कि जिस फिल्‍म का ट्रेलर इतना देखा गया, उस फिल्‍म को कितना लोग देखेंगे। जबकि यही सबसे बड़ा भ्रम है। अरे भाई, यू ट्यूब खुद कहता रहता है कि इतने रुपये दो तो इतने लोगों तक वीडियो पहुंचायेगा। म्‍यूजिक कंपनियां इस खेल को बड़ी चतुराई से खेलती हैं।

आइये अब इस भ्रम के पीछे छुपी हकीकत को समझते हैं। मान लीजिए कि किसी फिल्‍म को बिहार में अगर एक लाख लोग भी देखते हैं, जहां एक टिकट की औसत कीमत 50 रूपये है तो कलेक्‍शन होना चाहिए 5 करोड़। लेकिन क्‍या आपने कभी सुना कि भोजपुरी की किसी भी फिल्‍म ने पिछले दो सालों में बिहार से एक करोड़ का भी कलेक्‍शन किया हो। एक करोड़ तो छोड़िए, जिन एकाध फिल्‍मों को ठीकठाक समझा गया, उसका भी कलेक्‍शन 50-60 लाख के आसपास ही रहा। अब बताइये कि निर्माता यू ट्यूब के उस व्‍यूज को लेकर क्‍या चाटेगा?

बात अगर ‘क्रेक फाइटर’ की ही करें तो कहा यही जा रहा है कि साढ़े तीन करोड़ की लागत से बनी है, जबकि ट्रेलर देखकर ऐसा लगता नहीं। जानकार कहते हैं कि लगभग पांच मिनट के ट्रेलर में भी एक मिनट का स्‍टॉक यूज किया गया है। इसके अलावा एक अहम सवाल ये भी है कि अगर ये फिल्‍म इतनी ही दमदार बनी है और पवन सिंह का वाकई जलवा है तो बेचारे निर्माता को बिहार से एम जी क्‍यों नहीं मिला? जिस पवन सिंह की फिल्‍मों को कभी 75-80 लाख तक का एम जी मिलता था, दो-चार महीने पहले तक 40-45 लाख तक मिला है, उसी पवन सिंह की फिल्‍म को कमिशन या यूं ही किसी आपसी सहमति के आधार पर क्‍यों रिलीज किया जा रहा है?

दरअसल, भोजपुरी मेकर्स को चाहिए कि वो हकीकत को पहले समझें, फिर फिल्‍म बनायें। अगर पुराने तथाकथित स्‍टारों का ये हाल है तो फिर नये लोगों को आजमाने में क्‍या बुराई है? भारतीय क्रिकेट आज अगर विश्‍व में डंका बजा रहा है तो इसीलिए कि नये-नये खिलाड़ियों को मौका दिया जा रहा है। इसी तरह भोजपुरी मेकर्स को भी चाहिए कि वो नये लेखक से लेकर नये निर्देशक, नये गीतकार, नये संगीतकार को आजमायें। उन्‍हीं में से लोग आगे निकलेंगे और इंडस्‍ट्री को नयी दिशा मिलने के साथ ही इसकी दशा भी सुधर जायेगी।