एक्‍सक्‍लूसिव कहानी ‘जंग सियासत के’ की : ऐसे ठनी थी जंग लेखक-निर्देशक और हीरो के बीच

बिहार और झारखंड में आज एक और फिल्‍म ‘जंग सियासत के’ रिलीज हुई है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इसके निर्माण के दौरान ही इसके लेखक नंदू सैनी निर्मोही और हीरो कम निर्माता श्रीप्रकाश जायसवाल के बीच ऐसी जंग शुरू हुई कि नंदू को प्रोजेक्‍ट बीच में ही छोड़कर भागना पड़ गया था।

सुनिए उस जंग की कहानी, खुद नंदू निर्मोही की जुबानी –

‘जंग सियासत के’ फिल्म की कहानी मैंने बहुत ही मेहनत और उम्मीद के साथ लिखी थी। इस कहानी का डायरेक्‍शन भी मैं खुद ही करना चाहता था, इसलिए किसी प्रोड्यूसर की तलाश में इधर उधर भटक रहा था। उसी दौरान मुझे मेरे मित्र श्रीप्रकाश जायसवाल, जो फिल्‍म के हीरो हैं, उनका फोन आया। उन्होंने बताया कि कि वो एक फिल्म बनाना चाहते हैं। मेरी उनसे बात हुई और उन्‍होंने मुझे मिलने के लिए आजमगढ बुलाया। मैंने वहां जाकर उनको कहानी सुनाई और वो उस कहानी पा फिल्म बनाने को तैयार हो गये।

अप्रैल 2016 में हम लोग मुंबई गये और वहां रिकार्डिंग और बाकी कलाकारों के चयन का काम शुरू हो गया। कहानी दो हीरो की थी, जिसमें एक श्रीप्रकाश जायसवाल खुद थे। बहरहाल, सारी तैयारी के बाद इसकी शूटिंग एक अगस्त से आजमगढ़ में शुरू की जानी थी। पूरी टीम 31 जुलाई को आजमगढ़ पहुंच भी गई। मैं सुबह शूटिंग करने की तैयारी में लगा था कि मेरे घर (लखनऊ जहां मैं रहता था ) वहां से फोन आ गया की मेरी बेटी (जो 7साल की ) छत से नीचे गिर गई है और हास्पिटल मे भर्ती है। मैंने किसी तरह मामले को संभाला और दूसरे दिन से शूटिंग शुरू कर दी। शूटिंग के दौरान आनेवाली तमाम समस्याओं का सामना करते हुये मैंने काम इसलिए पूरा किया, क्‍योंकि फिल्‍म के हीरो हमारे पुराने मित्र थे। मित्र होने के नाते ही हमारे और उनके बीच कोई लिखित एग्रीमेन्ट नहीं बना था।

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था, मगर पोस्ट प्रोडक्‍शन के दौरान श्रीप्रकाश जायसवाल ने एडिटिंग में हस्‍तक्षेप करना शुरू कर दिया। मुझे ये चीज अच्छी नहीं लगी, क्‍योंकि मैं फिल्म को जो रूपरेखा देना चाहता था, उससे वो अलग ही आकार ले रही थी। इस बात को लेकर हमारी उनसे काफी बहस हुई और मैं फिल्‍म को छोड़कर वापस लखनऊ आ गया। फिर सारा पोस्ट प्रोडक्‍शन का काम उन्‍होंने ही अपने तरीके से किया। बाद में जब फिल्म का ट्रेलर आया तो मैने देखा कि मेरा नाम उसमें केवल लेखक के तौर पर दिया गया था। निर्देशक की जगह हीरो महोदय का ही नाम दिया गया है। सबसे बड़े दुख की बात तो यह है कि आज जब मैंने फिल्म देखी है तो मेरी हैरानी का ठिकाना नहीं रहा, क्‍योंकि मैंने इस फिल्‍म की जो कल्पना की थी, रिजल्‍ट उसका 10% भी नहीं आया है।

 

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