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न्यायालय  में एक मुकद्दमा आया, जिसने सभी को झकझोर दिया। अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था।

एक 70 साल के बूढ़े व्यक्ति ने अपने 80 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा कर दिया। मुकद्दमे का मजमून कुछ यूं था- “मेरा 80 साल का बड़ा भाई अब बूढ़ा हो चला है, इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता। मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 110 साल की मां की देखभाल कर रहा है।

मैं अभी ठीक हूं, इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाये।”

न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि दोनों भाई 15-15 दिन अपने साथ रखो।

मगर दोनों भाइयों में से कोई टस से मस नहीं हुआ। बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने  स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूं….अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।

छोटा भाई कहता कि बड़े भाई पिछले 40 साल से अकेले सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना कर्तव्य कब पूरा करूंगा।

परेशान न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये, मगर कोई हल नहीं निकला। आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए अदालत में बुलवाया और पूछा कि वह किसके साथ रहना चाहती हैं।

बेहद कमजोर पड़ चुकी मां का वजन बमुश्‍किल 30 किलो वजन रह गया था और वो बड़ी मुश्किल से व्हील चेयर पर आई थी। उसने अदालत से मुखातिब होते हुए दुखी दिल से कहा कि उसके लिए दोनों संतानें बराबर हैं। वह किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर, दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती। निर्णय करना अदालत का काम है। अदालत का जो निर्णय होगा, उसको वो मान लेगी।

आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय देते हुए कहा कि न्यायालय छोटे भाई की इन भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।

फैसला सुनकर बड़ा भाई जोर जोर से रोने लगा कि इस बुढापे ने मेरे स्वर्ग को मुझसे छीन लिया। अदालत में मौजूद न्यायाधीश समेत सभी रोने लगे।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर भाई-बहनों में वाद विवाद हो, तो इस स्तर का नहीं होना चाहिए कि मां किसकी है और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं। ऐसा करना पाप है!यह मुकदमा समाज को ये सबक देता है कि माता -पिता का दिल नहीं दुखाना चाहिए।

 

 

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