इसलिए हो रही है अरविंद अकेला और रितेश पांडेय की चांदी

समझदार वही होता है, जो वर्तमान में एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखता है और भविष्‍य को लेकर चिंतित रहता है। मतवालों को यही लगता है कि उनके वर्तमान जैसा ही उनका भविष्‍य भी चकाचक बना रहेगा।

अगर आप अतीत को गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि दिनेश लाल यादव, पवन सिंह और खेसारी लाल तीनों का हाल कमोबेश एक जैसा रहा है। हालांकि शुरूआत में दिनेश लाल ने थोड़ी समझदारी और सतर्कता जरूर बरती, लेकिन काल के प्रवाह में वो भी बह गये और आज अपने किये का अंजाम भुगतने को मजबूर हैं।

कहने का तात्‍पर्य यह कि जिस तरह की अश्‍लीलता पवन और खेसारी परोस रहे थे, वैसी ही दिनेश भी परोसने लगे। इन तीनों ने अपनी हीरोइनें फिक्‍स कर लीं।

कहानी चाहे जैसी हो, हीरोइन वही। सवाल ये है कि आखिए एक ही जोड़ी को कोई कितना देखे। जाहिर है, इन्‍हें जरा भी भविष्‍य की परवाह होती तो ये ऐसा कभी नहीं करते।

आज का कड़वा सच ये है कि अश्‍लीलता और घटिया दर्जे की फिल्‍मों ने आज इन तीनों सितारों को लगभग बेरोजगारी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। खबरों के मुताबिक चार महीने से एक भी फिल्‍म साइन नहीं की है इन तीनों ने। अब जब फिल्‍म मिल ही नहीं रही है तो ये साइन क्‍या करें और जब फिल्‍म साइन ही नहीं करेंगे तो अगले साल रिलीज क्‍या होगी….यानी अंधकार ही अंधकार।

इनका दूसरा सहारा स्‍टेज शो है। वहां भी भगदड़ मच रही है। खास तौर से खेसारी के मंचों पर यह समस्‍या हर एक दो महीने के बाद देखने को मिल जा रही है। अब तो उन्‍होंने राजनीतिक दुश्‍मनी भी पाल ली है। इसका भी असर अब उनके शोज पर पड़नेवाला है।

अब विचार इस बात पर करते हैं कि आखिर इन परिस्‍थितियों का फायदा किसको हो रहा है…सबसे ज्‍यादा फायदा कल्‍लू और रितेश को हो रहा है। दोनों धड़ाधड़ फिल्‍में साइन कर रहे हैं। रितेश को तो अब अक्षरा का भी साथ मिल गया है, इसलिए गाड़ी और तेज गति से भाग रही है। दरअसल, निर्माता इन्हें लेना इसलिए सेफ समझ रहे हैं, क्‍योंकि एक तो ये दोनों पब्‍लिक में थोड़े लोकप्रिय हैं, दूसरे ये पांच-दस लाख पारिश्रमिक लेनेवाले लोग हैं।

रही बात प्रदीप पांडेय उर्फ चिंटू की, तो उनका पिता-पुत्र वाला 80 लाख का पैकेज सुनकर ही निर्माता भाग खड़े होते हैं। बाकी जो बचे, अब उनकी बात ही क्‍या करें…

बहरहाल, सारी चीजें देखने के बाद ऐसा लगता है कि इंडस्‍ट्री में जल्‍दी ही बदलाव का एक ऐसा दौर आनेवाला है, जब भोजपुरी में नये लोगों को काम करने का मौके मिलेंगे। अगर नये निर्माता और नये निर्देशकों ने इंडस्‍ट्री में आकर नये कलाकारों को लेकर अच्‍छा काम किया और बर्बाद हो चुके वितरकों ने उनसे मिलजुलकर उनकी फिल्‍मों को ठीक तरह से रिलीज किया तो भोजपुरी को निश्‍चित रूप से एक नयी दिशा और दशा दोनों मिल सकती है।

 

 

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