आप धन्वन्तरि नही हैं डा. साहेब, इतनी भी ज़िद ठीक नहीं


बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान से मैं चौबीस वर्षों से बावस्त हूं। यहां न्यूरो, आइसीयू, गायनिक, पीडिया, नेफ़्रो, आंकोलॉजी, या ऐसे ही दर्ज़नों विभागों का खुला खेल ज़ारी है। सबको पता है किस विभाग की दवा किस दुकान पर मिलेगी। डा. पैथाॅलाॅजी और रेडियोलॉजी की जाँच के लिए विधिवत विज़िटिंग कार्ड देकर रियायत प्रोवाइड कराते हैं। यदि आप उनके निर्देश का पालन नहीं करते तो भगवान भी आपकी मदद नहीं कर पाएगा।

गैस्ट्रो के डाक्टर सारी जांच मेट्रोपोलिस में भेज देते हैं। और बताते हैं, जाओ बहुत अच्छा आदमी है..सस्ते में सारी जांच करवा देगा। 
इस जांच केन्द्र में जितने साधन, इक्विपमेंट्स हैं, वो किसी गुमटी के एक कोने में आ सकते हैं। लेकिन वह सारी जाँच कराकर आपको सौंप देगा।

बीएचयू गेट लंका पर दर्ज़नों ऐसे मेडिकल स्टोर हैं जिनकी दुकानों में दवाओं की कुछ स्ट्रीप्स, एंपुल, और सर्जिकल ब्लेड, काॅटन, सिरिंज रखे हुये हैं। लेकिन इन दुकानों पर आठ-दस लड़के लगातार दौड़ लगाते रहते हैं। आपके हाथ से पर्ची लेकर आपको ये दस मिनट में सारी दवा उपलब्ध करा देंगे। और यह सब चैरिटी में नहीं होता… इसकी क़ीमत धन्वंतरियों को अबाध पहुँचाई जाती है।

मेडिकल कंपनियों की दवाओं का पूरा डाटाबेस है, उन्हें पता है उनका कितना आइटम किस डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब किया ..? आख़िर यह सब कैसे होता है…?

आप कहते हैं आपको सुरक्षा चाहिए ! इस देश में ऐसे हीं होता है सब। आप किसी को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते, आपका पूरा बिजनेस असुरक्षा के व्यवासय से संचालित हो रहा है, तो खुद सुरक्षा की मांग कैसे कर सकते हैं आप ??

जूनियर डॉक्टर्स के हॉस्टल एमआर से भरे रहते हैं। उनकी जीवनशैली इतनी महँगी है कि ताज्जुब होता है ! उनके हाथ से जब आप गिफ़्ट पैक लेते हैं तो उसकी भरपाई किसी की मौत और महंगी दवाओं से आप करते हैं…यह भूलना नहीं चाहिए।

बीएचयू के ही एक बड़े प्लास्टिक सर्जन हैं। उनकी पत्नी भी वही गायेंकोलाॅजिस्ट हैं। भगवान ने इन दोनों की क़माल जोड़ी बनाई है। बीवी-खसम दोनों घुसखोर !

अठारह साल पहले मेरी मां जल गयी थी। इन भगवान को मुझे अपने स्कॉलरशिप से पांच हज़ार घूस देकर डेट लेनी पड़ी थी। और ऐनवक़्त आपरेशन जूनियर डाॅक्टर से करवा दिया। मेरी मां जो पार्किंसन और सिजोफ्रेनिया से जूझ रही थी, वह विकलांग भी हो गयी।

ऐसी करोड़ों कहानियां आधे हिन्दुस्तानियों की आंखों में गुबार और आंसुओं के साथ उठती और सूख जाती हैं…यदि आपका ज़मीर गवाही दे तो कभी उनके सुरक्षा की भी बात कीजिए…!!

आपके साथ जो हुआ बहुत बुरा हुआ। सभ्य समाज उसका समर्थन नहीं कर सकता, लेकिन औरों को भी देखिए…पत्रकार मार दिए जाते हैं, उन्हें मुआवज़ा तक नहीं मिलता। गुंडे ..आइएस, आइपीएस अधिकारियों तक का गिरेबान खींच लेते हैं। उन पर कहीं ट्रैक्टर चढ़ा दिया जाता है…कहीं गोली मार दी जाती है..मुरैना और मथुरा में ऐसा ही हुआ।

एडमिशन काउंटर पर बैठे अध्यापक को छात्र-गुंडे अवैध एडमीशन के लिए पीट देते हैं। छात्रसंघ चुनाव में हारा हुआ प्रत्याशी महीनों अध्यापको को धमकी देता है, राड-डंडा लेकर पीछा करता है। नकल करने के लिए जौनपुर और आज़मगढ में प्राचार्यों को गोली मार दी जाती है। ऐसी ख़बरें हिन्दुस्तानी रवायत का हिस्सा हो चुकी हैं..।

आप भगवान बनना चाहते हैं तो थोड़ा लहरी साहब का चरित्र धारण करिये…दुनिया आपको पूजेगी…और सुरक्षित तो इस ज़हां में कोई नहीं है। ठीक अपनी नाक के नीचे देखिए..दुनिया का स्याह-उजास दोनों वहां दिख जाएगा।

-अंबुज पांडेय