“मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा ज्ञान किसे होता है?

प्रश्न:* हे गुरुदेव! “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा ज्ञान किसे होता है? बुद्धी को? या ब्रह्म को?।

* वेदान्त का उत्तर:* हे शिष्य, अब तू अपनी बुद्धि से ध्यान पूर्वक ‘अहं’ शब्द का अर्थ सुन ! जिससे तेरे समस्त शंकाओं का समाधान हो जाएगा। हे शिष्य! हर प्राणी की बुद्धि एक दर्पण के समान है जिसमें स्थूलशरीर की अपेक्षा एक विशेष गुण है- इसमें चेतन का प्रतिबिंब बनता है, (चिदाभास)। प्रतिबिंब सहित इस बुद्धि रूपी दर्पण को ‘अह्म’ कहते हैं अर्थात ‘मै’ यानी ‘जीव’। अब जैसा दर्पण है वैसा ही प्रतिबिंब बनेगा। पशु पक्षी की अपेक्षा मनुष्य की बुद्धि में एक विशेषता है उसमे ‘मै’ पन का बुद्धिपुर्वक बोध भी है- जिसे ‘अह्म-आकार’ कहते हैं। और यह ‘अह्म’ जिस चेतन पदार्थ का प्रतिबिंब है उसी पर आरोपित भी होता है, और उसे उस बुद्धी की आत्मा कहते हैं। यह आत्मा ही ‘ब्रह्म’ है।
एक बुद्धि की दृष्टि से इसे आत्मा कहते हैं और और सर्व बुद्धि की दृष्टि से ‘ब्रह्म’। यह अह्म जब शरीर में बैठ जाती है तब वह मनुष्य हो जाता है, और अह्म जब आत्मा में बैठ जाती है तब ब्रह्म।

#भगवान्_बोले; हे अर्जुन! इन सभी जड़ शरीरों के अंतःकरण में स्थित सबका आत्मा “मै” हूँ। तथा इन संपूर्ण भौतिक प्रप्नच का आदि कारण, मध्य और अंत भी “मैं” हूँ।

हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों का क्षेत्रज्ञ अर्थात समस्त शरीरों का आत्मा मुझे ही जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को का जो तत्व से जानना है वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है।

#श्रीकृष्ण_गीता

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